।। अथर्ववेद ।।

चार वेद

वाचस्पतिर्नि यच्छुत।

विद्वान नियम से चलें।

विद्वान सबको अनुशासन में रखें। विद्वान नियमों में चलें जिससे अन्य उनसे प्रेरणा लेकर नियमबद्ध जीवन जियें। नियम से कार्य करने के प्रतिफल में कार्य शीघ्र पूरा होता हैं और उन्नति पथ प्रशस्त होता है। अत% नियमों में चलना और चलाना चाहिये।

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सं श्रुतेन गमेमहिमा श्रुतेन वि राधिषि।

हम सब ज्ञान से युक्त हों] उससे कभी विरोध न करें।

हम सब ज्ञानी बनें और ज्ञान का कभी विरोध न करें। विधा ज्ञान से प्राप्त होती है। जगत के मूल तत्वों का ज्ञान प्राप्त करना और उससे निज उन्नति की रीति जानना] यह सब सीखना ही विधा है। विधा गुरु से प्राप्त होती हैं। गुरु को शुभ संकल्पों के साथ शिष्यों का आनन्द बढ़ाते हुए पढ़ाना चाहिए जिससे वह सहज होकर पढ़ता जाए। शिष्य के मन में विधा प्राप्त करने की इच्छा हो और पढ़ा हुआ ज्ञान सिथर रखे जिससे अधिक ज्ञान पाने को तत्पर हों।


वैदिक शास्त्र के प्रचार मे सर्मपित।

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