।। ऋग्वेद ।।

चार वेद

महो अर्णः सपस्वती प्रचेतयति केतुना।
धियो विश्वा वि राजति।

विधा ज्ञान से जगतरूपी महासागर का बोध कराती है और समस्त बुद्धियां को प्रकाशित करती है और समस्त बुद्धियों को प्रकाशित करती हैं।

विधा ज्ञान से मिलता है और ज्ञान से बुद्धि विकसित होती है। बौद्धिक विकास से उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। अतः उत्तम ज्ञानवद्र्धक पुस्तकों के अध्ययन से सुविचार मिलते हैं जिनसे सुसंगति की प्रेरणा मिलती है और प्रतिफल में बौद्धिक विकास के साथ-साथ सच्चा-सुख पाने का मार्ग प्रशस्त होता है।

Pushp

अस्मान्त्सु तत्र चोदयेन्द्र राये रभस्वतः।
तु विधुम्न यशस्वतः।

हे तेजस्वी! प्रयत्नशील और यशस्वी लोगों को ही धन के लिए प्रेरित कर!

प्रयास करने वाले धन को पाते है। धन प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। जो प्रयत्न करता है वह यशस्वी होता है। और सदैव प्रयत्न करता रहता है। यह जान लें कि प्रयत्न कभी व्यर्थ नहीं जाते है।


वैदिक शास्त्र के प्रचार मे सर्मपित।

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