।। सामवेद ।।

चार वेद

अगिनवर्त्राणि जडघनद।

अग्नि वृत्रों को मारता हैं।

वृत्रों से तात्पर्य अन्धकार और शत्रु से हैं। अग्नि के प्रज्जवलित हो जाने पर प्रकाश उत्पन्न होता है और अन्धकार का नाश हो जाता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह व अंहकाररूपी पांच विकार भी हमारे शत्रु हैं। इनको नष्ट करने केलिए ज्ञानाग्नि को उपयोग में लाना चाहिए।

Pushp

अग्ने! नः दृशे छेवः असि।

अग्नि मार्ग दिखाने वाला देव हैं।

अग्नि में प्रकाश उत्पन्न करने की शकित विधमान है। प्रकाश से तम दूर हो जाता है और अन्धेरे में क्या है, इसका ज्ञान सरलता से हो जाता हैं। अतः अग्नि रूपि ज्ञान से तम का नाशक है और पथ-प्रदर्शक हैं।


वैदिक शास्त्र के प्रचार मे सर्मपित।

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