।। भारतीय समाज मे वैदिक सांस्कृति का महत्व ।।
आज सेआज से कुछ हजार-पद्रह सो वर्षों पहले जब भारत अपने सर्वणीम काल में था, तब उस काल में सामाजिक व्यवस्था में वैदिक आचरण का ही पूर्ण रूप सें पालन होता था। सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था, शिक्षण व सांस्कृति का वैदिक मुल्यों पर आधारित आचरण होता था। यह भारत आर्यावत के नाम से उदबोधित होता था। यहां पर रहने वाले लोगों को आर्य कह कर सम्बोधित किया जाता था। आर्य वही कहलाया जाता था जो वेदों में प्रर्दशित उच्च विचारों व मर्यादाओं का पालन करता हो। वर्तमान समय में कुछ लोग आर्य शब्द को किसी विषिठ जाती समझ बेठें है। मनुष्य किसी जाती से विशिष्ठ नहीं बनता अपितु अपने आचरणों से विशिष्ठ बनता या माना जाता है।
जब तक भारत का सामाज वेदानुकूल आचरण करता रहा तब तक इस धरा के निवासी सब प्रकार से सम्पन्न, समृद्ध, सर्वत्र विजयी, यशस्वी, वर्चस्वी, तेजस्वी, महोधोगी, अतुल पराक्रमी, ज्ञानी, ध्यानी बने रहें। जब से इस भारत के वासीयों ने वेदानुकूल रहने का परित्याग किया, इसका हनन किया, समृद्धता चलीगयी है, आर्य श्रीहीन, तेजोविहीन, वर्चो-रहित, तपःशुन्य, प्रमादी, आलसी बनकर पददलित होने लगें हैं।