।। शरीर रक्षतो धर्मः ।।
आज के समय में वैसे तो कर्इ स्वास्थ रक्षक प्रणालियां प्रचलित है, परन्तु इन मे से कुछ ही ऐसी पद्धतियां वास्तव मे दीर्घ काल के लिये लाभप्रद सिद्ध हुर्इ है। पारंपरिक प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली के दीर्घ काल के लिये लाभप्रद परिणाम प्राप्त की ये जा सकते है।
प्राकृतिक चिकित्सा का प्रमुख सिद्धान्त-
प्राय: सभी प्रकार के रोग एक ही कारण से होते है। हमारे शरीर में बहुत से विजातीय पदार्थ जमा हो जाते हैं जो शरीर के लिए हानिकारक हैं। रोग का उपचार शरीर के इन विकार-युक्त भागों को शुद्ध करके शुरु किया जाता हैं।
रोग के उपचार में निम्नलिखित प्राकृतिक विधियां काम में लार्इ जाती हैं। इन सभी में शरीर के अंगों को शुद्ध रखना तथा पुनः कि्रयाशील बनाना समिमलित हैं।
- उपवास- यह स्वस्थ होने की सबसे शकितशाली प्राकृतिक विधि है।
- भोजन- भोजन के रुप में ऐसे शाकाहारी पदार्थों का सेवन करना चाहिये जिसमें प्रोटीन के साथ भोजन के सभी तत्व उपसिथत हों, जैसे सब्जी, फल, दूध, फलों का रस आदि। कुछ चीजें काम में नहीं लेनी चाहिये, जैसे स्टार्च, आइसक्रीम, केक, रासायनिक विधियों से तैयार किये गए शरबत व पेय।
- ठण्डे़ तथा गर्म पानी का उपयोग- एनिमा, गीले या ठण्डे़ कपडे़ से स्नान।
- शरीरिक व्यायाम- सांस का व्यायाम, सूर्य स्नान तथा ताजी हवा का सेवन।
- मनोवैज्ञानिक चिकित्सा।
- मालिश।
- रंगीन रशिम चिकित्सा।